Sunday, April 5, 2009

प्रदीप मिश्रा जी के ब्लॉग से उनकी नयी कविता दे रहा हूँ -
घर-बाहर जो हर जगह निष्ठा से बंधा होता है
बड़ों से छोटों तक की नजरों में गधा होता है
जब तक उसने कुछ को कहीं का नहीं छोड़ा
जमाना उसे नहीं मानता उसे घोड़ा
क्या करें, हमारे जैसे कई लोग एक से ही सधे हैं
इसलिए हम फिक्र नहीं करते कि हम गधे हैं
सुअर के बारे में मेरा मानना है-
हम मुंह जरूर मारते हैं इधर-उधर
बावजूद इसके नहीं पालते सुअर
क्योंकि सुअर का बच्चा प्यारा होता है
बड़ा सुअर तो पक्का आवारा होता है
बड़ी कविता का एक अंश है । प्रदीप जी पत्रकार हैं मगर कविता भी लिखते हैं । इंसान बहुत अच्छे हैं। आप भी कविता का आनंद उठाइए।

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